वे कह रही हैं, रात्रि स्वप्न में उन्होंने देखा कि, वे माँस खा रही हैं। उन्होंने अपने जीवन में कभी माँस खाने का विचार तक नहीं किया है। यह स्वप्न आना उन्हें अपार पीड़ा दे रहा है।
उन्हें कहा गया जरा ठीक से जाग कर उस स्वप्न को देख लीजिए!
अगले ही पल वे मुस्कुरा उठी।
कभी हमने-आपने गौर किया है कि, जिस भी विचार से हम आविष्ट हो रहे होते हैं, वही हमें और हमें मिलने वाले दुख को निर्मित कर रहा होता है।
बस एक कौंध कि, यह सब कुछ स्वप्न है, सारा दुख अपने दुखी के साथ नहीं पाया जाता है।
सबसे करामाती तथ्य इसमें यह है कि, स्वप्न की संरचना के लिए आपका होना यानि बद्धाभिमानी होना जरूरी है।
यह स्वप्न है ऐसी अंतर्दृष्टि के लिए जो जागरण है, वही साक्षी है।
यह स्वयंभू अंतर्दृष्टि मुक्ताभिमानी है।
साक्षी पर प्रचलित संवाद शृंखला में इस बार हम साथ चलकर जाँचते हैं, वह मुक्ताभिमानी अंतर्दृष्टि जो व्यक्तित्व शून्य है।
अन्वेषी मित्रों का स्वागत है। 🙏