गायक - गोपाल दास वैष्णव8
भजन - राम सुमर मेरा भाई रे
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मन तू राम सुमरले भाई
सुमरया बिना मुक्ती नही होवे
भव जल गोता खाई . . . 0 |
लख चोरासी भटकत भटकत
अबके मनुष तन पाई
ऐसा अवसर फिर नही आवे ,
आखीर में पछताई
( मन रे राम सुमरले भाई
सुमरया बिना मुक्ती नही होवे
भव जल गोता खाई .
विषय वासना माया का चक्कर में ,
बार बार भरमाई अन्त समय जम ले जावे ,
घणा नरक भुगताई
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