The best discourse on the significance of Gopi Prem by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj. He elaborates on his own pad - "Udho! Kahiyo Hari Samujhaye (ऊधो! कहियो हरि समुझाय)" from Prem Ras Madira (Virah Madhuri).
Written and Composed by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj.
ऊधो ! कहियो हरि समुझाय ।
हम सब उनहिं न कबहुँ बिसरिहैं, वे चाहे बिसराय ।
वे मेरे प्रियतम, प्राणेश्वर, हम अबला असहाय ।
हम सब भई सनातन चेरी, वे चाहे ठुकराय ।
चितवत पंथ रैन-दिन दैहौं, अगनित जनम बिताय ।
पै 'कृपालु' को भय 'पिय जग सों, तव परतीत न जाय' ।।
भावार्थ - ब्रज-गोपियाँ उद्धवसे अपने प्यारे श्यामसुन्दरके लिए संदेश भेजती हैं।
"ऊधो ! प्रियतम से यह समझाकर कहना कि हम सब तो उन्हें कभी नहीं भूल सकतीं, वे चाहे हमें भुला ही क्यों न दें । हे उद्धव । वे मेरे प्रियतम एवं प्राणोंके स्वामी हैं, तथा हम सब ब्रज-गोपियाँ केवल उन्हींके बल एवं सहारेपर हैं । हम सब तो अनन्तकालके लिए उनकी दासी बन चुकी हैं, वे चाहे कितना ही ठुकरायें। यह हम सब ब्रज-गोपियोंका दृढ़ निश्चय है कि दिन-रात प्रियतम की प्रतीक्षा करते हुए हम सब उनकी मिलन-माधुरीकी आशामें अनन्त जन्म बिता देंगी । "कृपालु" कहते हैं कि हे प्रियतम ! ब्रजगोपियोंको केवल यही भय है कि कहीं तुम्हारे न आने से संसार का तुमसे विश्वास न उठ जाय, अर्थात् अल्पज्ञ लोग तुम्हारी अकारण-करुणा की अन्तरंगता को न समझते हुए तुमको निष्ठुर न कहने लगें ।"
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