दाहिने हाथ में जल लेकर ' अस्य कर श्रीप्रत्यङ्गिरास्तोत्रमन्त्रस्य ' से आरम्भ ' सर्वार्थसाधने विनियोगः ' तक पढ़कर जल को नीचे किसी पात्र में गिरा देना चाहिए ।
मन्दराचल पर सुखपूर्वक बैठे हुए भगवान् शंकर के पास आकर पार्वती ने पूछा ।
देवी ने कहा- जो प्रत्यङ्गिरा नामक महाविद्या उत्तम फल देने वाली है , जिससे स्त्री - पुरुषों का हित तथा बालकों की रक्षा होती है ।
माण्डलिक राजा , दीनजन , विद्वान् तथा द्विजातियों का जो विशेष रूप से मनोरथ सिद्ध करने वाली है ।
भयंकर , महाभय , बिजली , अग्निभय , व्याघ्र , नदी , नद , समुद्र , श्मशान , दुर्गमस्थान , घोर संग्राम , शत्रुसंकट , मारणादि अभिचार और राजकुल आदि में धारण तथा पाठ से जो अभिलाषित वस्तु देने वाली है , साधकों के द्वारा पढ़ने पर जो सभी मनोरथ पूर्ण करती है
जो सम्पूर्ण सौभाग्यों की जननी तथा समस्त मनुष्यों को वश में करने वाली है , हे सुरश्रेष्ठ , आप मुझे उस विद्या को बताइए । भैरव ने कहा- हे प्राणियों का हित करने वाली - महाभागे पार्वती ! तुमने यह प्रश्न ठीक ही किया । हे असुरों का विनाश करने वाली , मैं उस महाविद्या को तुम से कह रहा हूँ , इसमें संशय नहीं है ।प्रत्यङ्गिरा देवी , जो महाविद्या के नाम से विख्यात् है वही सम्पूर्ण ग्रहों का निवारण करने वाली , दुष्टों का मर्दन करने वाली तथा समस्त पापों का विनाश करने वाली है ।
वह देवी सौभाग्य की जननी ( माता ) , बल तथा पुष्टि प्रदान करने वाली है , चतुष्पथ , घोर वन , झंझावात राजद्वार , दुर्भिक्ष तथा महाभय उपस्थित होने पर , पढ़ने तथा पाठ कराने से सम्पूर्ण सिद्धियों को देने वाली है ।जो महाविद्या के इस मन्त्र तथा यन्त्र को लिखकर बाहु , हाथ , कण्ठ तथा सिर में धारण करते हैं , वे सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाते हैं और कभी अकाल मृत्यु से नहीं मरते । योग से युक्त पुरुष यदि इस महाविद्या के यन्त्र तथा मन्त्र को धारण करे तो निश्चय ही उसकी रक्षा होती है । धारण तथा अर्चन - पूजन से यह प्रत्यंगिरा शुभफल देने वाली है ।उसके घर में आठों सिद्धियों का निवास रहता है , देवता , राक्षस , पन्नग ( सर्प ) तथा अन्य पीड़ाकारक ग्रह उसके घर में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं करते ।
विद्याओं में सर्वोत्तम महाविद्या प्रत्यंगिरा भाषण से , पाठ से तथा पूजन - अर्चन से सिद्धि को प्रदान करने वाली है । यह महाविद्या नित्य है , भगवान् शंकर ने घोर ( निष्पाप ) रूप धारण कर इस घोररूपिणी ( निष्पापा ) महाविद्या का व्याख्यान किया है ।
प्रत्यंगिरा के शास्त्रीय अनुष्ठान मात्र से समस्त शत्रु विनष्ट हो जाते हैं तथा वह पुरुष जिसको अपने हाथ से स्पर्श करता है , जिसको जिह्वा से खाता है वह सब उसके लिए अमृत हो जाता है । उस पुरुष की कदापि मृत्यु नहीं होती और जो साधक इसको पढ़ता है उसको कभी कृत्रिम ( बनावटी ) तथा कठिन कष्ट नहीं होता । हे सुव्रते , जो पुरुष प्रत्यंगिरा का पाठ करता है , उसको भोजन शीघ्र ही तृप्ति प्रदान करता है , तथा पच जाता है । और इसके पढ़ने पाठ करने से कभी बार्द्धक्य ( बुढ़ापे ) का अनुभव नहीं होता , यह निःसन्देह है । १२
यह प्रत्यंगिरा मनुष्यों की रक्षा करने वाली है , सिद्धि देने वाली है और यह परा है तथा गोलोक में निवास करने वाली है । इनके सामने सभी मन्त्रों का प्रभाव नष्ट हो जाता है । यह महाविद्या सम्पूर्ण व्याधियों का विनाश करने वाली है , सिद्धि देने वाली है । महाविद्या की उपासना करने वाला पुरुष शत्रु के हाथ में गई हुई भूमि को भी प्राप्त कर लेता है ।
महाविद्या की उपासना करने से प्राणहारक शत्रु भी उसके वश में हो जाते हैं । इस सिद्ध विद्या के बारम्बार अनुष्ठान से मनुष्य विद्या को प्राप्त कर लेता है । गोलक यन्त्र के प्रभाव से तथा प्रत्यंगिरा के प्रभाव से और इस महाविद्या के धारण से ही मैंने त्रिपुर को जलाया । यह मन्त्र रक्षात्मक है और सभी मन्त्रों का राजा है । महाभय तथा विपत्ति काल में यह विद्या रक्षा करती है । घोर भयंकर स्थान में भी यह भयमुक्त करने वाली है । हे देवी , अधिक क्या कहें , इसके जप और पाठ करने वाले प्राणियों को सब कुछ निःसन्देह प्राप्त होता है।
AACHARYA HIMANSHU DHOUNDIYAL
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